ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं समुपस्थितम् । तदेव परमेशानि मन्त्रार्थ विद्धि पार्वती ।।

अर्थात् जब साधक सहस्रार चक्र में पहुंचकर ब्रह्मस्वरूप का ध्यान करते-करते जब स्वयं मंत्र स्वरूप या तादात्म्य रूप हो जाता है,उस समय जो गुंजन उसके हृदय-स्थल में होता है, वही मंत्रार्थ है।बीज मंत्रों का उच्चारण आपके आस-पास एक सकारात्मक उर्जा का संचार करता है,चमत्कारी बीज मंत्र सिर्फ एकपदीय जप नहीं होते बल्कि वो आपके आस-पास एक प्रभावशाली वातावरण बनाए रखते हैं जिससे आपकी ज़िंदगी की समस्याएं खत्म होती हैं। अगर आप एकाग्र होकर मंत्रों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना ले और उन पर विश्वास करें तो आप हर समस्या से उबर सकते हैं,चमत्कारी मंत्रों के उच्चारण से असंभव काम को भी संभव किया जा सकता हैं,बीज मंत्र पूरे मंत्र का एक छोटा रूप होता है जैसे की एक बीज बोने से पेड़ निकलता है उसी प्रकार बीज मंत्र का जाप करने से हर प्रकार की समस्या का समाधान हो जाता हैं ।

सौर मंडल में स्थित ग्रहों का मानव जीवन पर सीधे-सीधे प्रभाव पड़ता है,कुंडली में स्थित नौ ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। मंत्रों की शक्ति तथा इनका महत्व ज्योतिष में वर्णित सभी रत्नों एवम उपायों से अधिक है। मंत्रों के माध्यम से ऐसे बहुत से दोष बहुत हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं जो रत्नों तथा अन्य उपायों के द्वारा ठीक नहीं किए जा सकते। ज्योतिष में रत्नों का प्रयोग किसी कुंडली में केवल शुभ असर देने वाले ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए किया जा सकता है केवल उस ग्रह की ताकत बढ़ती है, उसका स्वभाव नहीं बदलता। दूसरी ओर किसी ग्रह विशेष का मंत्र उस ग्रह की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ उसका किसी कुंडली में बुरा स्वभाव बदलने में भी पूरी तरह से सक्षम होता है। इसलिए मंत्रों का प्रयोग किसी कुंडली में अच्छा तथा बुरा असर देने वाले दोनों ही तरह के ग्रहों के लिए किया जा सकता है।

जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। ज्योतिषीय संदर्भ में यह निर्विवाद सत्य है कि इस धरा पर रहने वाले सभी प्राणियों पर ग्रहों का अवश्य प्रभाव पड़ता है। मंत्र उच्चारण से ध्वनि उत्पन्न होती है, उत्पन्न ध्वनि का मंत्र के साथ विशेष प्रभाव होता है, जिस प्रकार किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु के ज्ञानर्थ कुछ संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मंत्रों से संबंधित ग्रह या देवता को संकेत द्वारा संबंधित किया जाता है, इसे बीज कहते हैं। मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है,मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है,मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैनिक,भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है। मानवशरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है,शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है। मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं :

मूलाधार 4×125=500

स्वधिष्ठान 6×125=750

मनिपुरं 10×125=1250

हृदयचक्र 13×125=1500

विध्रहिचक्र 16×125=2000

आज्ञाचक्र 2×125=250

कुल योग 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या)

भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं,विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ(Aura Photo Clinic) लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है,सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा। मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है। मंत्रों का चयन प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से किया गया है,वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसें आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं, अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं। मंत्र विज्ञान मंत्र एक गूढ़ ज्ञान है,सद्गुरु की कृपा एवं मन को एकाग्र कर जब इसको जान लिया जाता है, तब यह साधक की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है,बिन किसी बीज के मंत्र प्राणवान ओर प्रभावी नहीं बनता बस गुरु मुख से उचित कामना संगत योग्य बीज मंत्र का आरधान करना ही कल्याण का प्रसार माना गया है।

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